Gurucharitra Adhyay 14 | गुरुचरित्र अध्याय 14
गुरुचरित्र अध्याय 14 में बताया गया है कि कैसे गुरु के दर्शन से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि हमें गुरु के चरणों में समर्पण करना चाहिए और उनके दर्शन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। गुरु के दर्शन से हमारे सभी कष्ट दूर होते हैं और हम जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं। इस अध्याय में, हम देखते हैं कि कैसे एक बहुत ही कष्टपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्ति को गुरु के दर्शन से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। वह व्यक्ति जीवन में बहुत तरह के कष्टों का सामना कर चुका था और वह अपने जीवन से बहुत निराश हो गया था। एक दिन, वह व्यक्ति गुरु से मिला और उनसे मदद मांगी। गुरु ने उस व्यक्ति को बताया कि वह उसे सभी कष्टों से मुक्ति दिला देंगे। गुरु ने उस व्यक्ति को अपने चरणों में समर्पण करने और उनके दर्शन प्राप्त करने का प्रयास करने की सलाह दी। उस व्यक्ति ने गुरु की आज्ञा का पालन किया और गुरु के दर्शन प्राप्त किए। गुरु के दर्शन से उस व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो गए और उसने जीवन में सुख और शांति प्राप्त की।
🙏 Daily Guru Charitra पाठ और PDF अपडेट WhatsApp पर पाने के लिए अभी जुड़ें
📲 Join Guru Charitra WhatsApp Channel
📚 सम्पूर्ण गुरु चरित्र eBook
यदि आप सभी अध्याय एक साथ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Complete Guru Charitra eBook (PDF) अभी खरीदें और आध्यात्मिक ज्ञान को अपने पास सुरक्षित रखें।
📘 Buy Complete eBook
🛒 Amazon पर गुरु चरित्र पुस्तक
यदि आप Printed Book या Kindle Version पसंद करते हैं, तो Amazon से गुरु चरित्र पुस्तक अभी प्राप्त करें।
श्री गणेशाय नमः I
श्रीसरस्वत्यै नमः I श्रीगुरुभ्यो नमः I
नामधारक शिष्य देखा I विनवी सिद्धासी कवतुका I
प्रश्न करी अतिविशेखा I एकचित्ते परियेसा II १ II
जय जया योगीश्वरा I सिद्धमूर्ति ज्ञानसागरा I
पुढील चरित्र विस्तारा I ज्ञान होय आम्हांसी II २ II
उदरव्यथेच्या ब्राह्मणासी I प्रसन्न जाहले कृपेसी I
पुढे कथा वर्तली कैसी I विस्तारावे आम्हांप्रति II ३ II
ऐकोनि शिष्याचे वचन I संतोष करी सिद्ध आपण I
गुरुचरित्र कामधेनु जाण I सांगता जाहला विस्तारे II ४ II
ऐक शिष्या शिखामणि I भिक्षा केली ज्याचे भुवनी I
तयावरी संतोषोनि I प्रसन्न जाहले परियेसा II ५ II
गुरुभक्तीचा प्रकारु I पूर्ण जाणे तो द्विजवरू I
पूजा केली विचित्रु I म्हणोनि आनंद परियेसा II ६ II
तया सायंदेव द्विजासी I श्रीगुरू बोलती संतोषी I
भक्त हो रे वंशोवंशी I माझी प्रीति तुजवरी II ७ II
ऐकोनि श्रीगुरुचे वचन I सायंदेव विप्र करी नमन I
माथा ठेवून चरणी I न्यासिता झाला पुनःपुन्हा II ८ II
जय जया जगद्गुरू I त्रयमूर्तींचा अवतारू I
अविद्यामाया दिससी नरु I वेदां अगोचर तुझी महिमा II ९ II
विश्वव्यापक तूंचि होसी I ब्रह्मा-विष्णु-व्योमकेशी I
धरिला वेष तूं मानुषी I भक्तजन तारावया II १० II
तुझी महिमा वर्णावयासी I शक्ति कैंची आम्हांसी I
मागेन एक आता तुम्हांसी I तें कृपा करणे गुरुमूर्ति II ११ II
माझे वंशपारंपरी I भक्ति द्यावी निर्धारी I
इहे सौख्य पुत्रपौत्री I उपरी द्यावी सद्गति II १२ II
ऐसी विनंति करुनी I पुनरपि विनवी करुणावचनी I
सेवा करितो द्वारयवनी I महाशूरक्रुर असे II १३ II
प्रतिसंवत्सरी ब्राह्मणासी I घात करितो जीवेसी I
याचि कारणे आम्हांसी I बोलावीतसे मज आजि II १४ II
जातां तया जवळी आपण I निश्चये घेईल माझा प्राण I
भेटी जाहली तुमचे चरण I मरण कैचे आपणासी II १५ II
संतोषोनि श्रीगुरूमूर्ति I अभयंकर आपुले हाती I
विप्रमस्तकी ठेविती I चिंता न करी म्हणोनिया II १६ II
भय सांडूनि तुवां जावे I क्रुर यवना भेटावे I
संतोषोनि प्रियभावे I पुनरपि पाठवील आम्हांपाशी II १७ II
जंववरी तू परतोनि येसी I असो आम्ही भरंवसी I
तुवां आलिया संतोषी I जाऊ आम्हीं येथोनि II १८ II
निजभक्त आमुचा तू होसी I पारंपर-वंशोवंशी I
अखिलाभीष्ट तू पावसी I वाढेल संतति तुझी बहुत II १९ II
तुझे वंशपारंपरी I सुखे नांदती पुत्रपौत्री I
अखंड लक्ष्मी तयां घरी I निरोगी होती शतायुषी II २० II
ऐसा वर लाधोन I निघे सायंदेव ब्राह्मण I
जेथे होता तो यवन I गेला त्वरित तयाजवळी II २१ II
कालांतक यम जैसा I यवन दुष्ट परियेसा I
ब्राह्मणाते पाहतां कैसा I ज्वालारूप होता जाहला II २२ II
विमुख होऊनि गृहांत I गेला यवन कोपत I
विप्र जाहला भयचकित I मनीं श्रीगुरूसी ध्यातसे II २३ II
कोप आलिया ओळंबयासी I केवी स्पर्शे अग्नीसी I
श्रीगुरूकृपा होय ज्यासी I काय करील क्रुर दुष्ट II २४ II
गरुडाचिया पिलीयांसी I सर्प तो कवणेपरी ग्रासी I
तैसे तया ब्राह्मणासी I असे कृपा श्रीगुरुची II २५ II
कां एखादे सिंहासी I ऐरावत केवीं ग्रासी I
श्रीगुरुकृपा होय ज्यासी I कलिकाळाचे भय नाही II २६ II
ज्याचे हृदयीं श्रीगुरुस्मरण I त्यासी कैंचे भय दारुण I
काळमृत्यु न बाधे जाण I अपमृत्यु काय करी II २७ II
ज्यासि नांही मृत्यूचे भय I त्यासी यवन असे तो काय I
श्रीगुरुकृपा ज्यासी होय I यमाचे मुख्य भय नाही II २८ II
ऐसेपरी तो यवन I अन्तःपुरांत जाऊन I
सुषुप्ति केली भ्रमित होऊन I शरीरस्मरण त्यासी नाही II २९ II
हृदयज्वाळा होय त्यासी I जागृत होवोनि परियेसी I
प्राणांतक व्यथेसी I कष्टतसे तये वेळी II ३० II
स्मरण असे नसे कांही I म्हणे शस्त्रे मारितो घाई I
छेदन करितो अवेव पाही I विप्र एक आपणासी II ३१ II
स्मरण जाहले तये वेळी I धांवत गेला ब्राह्मणाजवळी I
लोळतसे चरणकमळी I म्हणे स्वामी तूंचि माझा II ३२ II
येथे पाचारिले कवणी I जावे त्वरित परतोनि I
वस्त्रे भूषणे देवोनि I निरोप दे तो तये वेळी II ३३ II
संतोषोनि द्विजवर I आला ग्रामा वेगवत्र I
गंगातीरी असे वासर I श्रीगुरुचे चरणदर्शना II ३४ II
देखोनिया श्रीगुरूसी I नमन करी तो भावेसी I
स्तोत्र करी बहुवसी I सांगे वृत्तांत आद्यंत II ३५ II
संतोषोनि श्रीगुरूमूर्ति I तया द्विजा आश्वासिती I
दक्षिण देशा जाऊ म्हणती I स्थान-स्थान तीर्थयात्रे II ३६ II
ऐकोनि श्रीगुरुंचे वचन I विनवीतसे कर जोडून I
न विसंबे आतां तुमचे चरण I आपण येईन समागमे II ३७ II
तुमचे चरणाविणे देखा I राहो न शके क्षण एका I
संसारसागर तारका I तूंचि देखा कृपासिंधु II ३८ II
उद्धरावया सगरांसी I गंगा आणिली भूमीसी I
तैसे स्वामी आम्हासी I दर्शन दिधले आपुले II ३९ II
भक्तवत्सल तुझी ख्याति I आम्हा सोडणे काय नीति I
सवे येऊ निश्चिती I म्हणोनि चरणी लागला II ४० II
येणेपरी श्रीगुरूसी I विनवी विप्र भावेसी I
संतोषोनि विनयेसी I श्रीगुरू म्हणती तये वेळी II ४१ II
कारण असे आम्हा जाणे I तीर्थे असती दक्षिणे I
पुनरपि तुम्हां दर्शन देणे I संवत्सरी पंचदशी II ४२ II
आम्ही तुमचे गांवासमीपत I वास करू हे निश्चित I
कलत्र पुत्र इष्ट भ्रात I मिळोनी भेटा तुम्ही आम्हां II ४३ II
न करा चिंता असाल सुखे I सकळ अरिष्टे गेली दुःखे I
म्हणोनि हस्त ठेविती मस्तके I भाक देती तये वेळी II ४४ II
ऐसेपरी संतोषोनि I श्रीगुरू निघाले तेथोनि I
जेथे असे आरोग्यभवानी I वैजनाथ महाक्षेत्र II ४५ II
समस्त शिष्यांसमवेत I श्रीगुरू आले तीर्थे पहात I
प्रख्यात असे वैजनाथ I तेथे राहिले गुप्तरूपे II ४६ II
नामधारक विनवी सिद्धासी I काय कारण गुप्त व्हावयासी I
होते शिष्य बहुवसी I त्यांसी कोठे ठेविले II ४७ II
गंगाधराचा नंदनु I सांगे गुरुचरित्र कामधेनु I
सिद्धमुनि विस्तारून I सांगे नामकरणीस II ४८ II
पुढील कथेचा विस्तारू I सांगता विचित्र अपारु I
मन करूनि एकाग्रु I ऐका श्रोते सकळिक हो II ४९ II
इति श्रीगुरूचरित्रामृते परमकथाकल्पतरौ
श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिद्ध-नामधारकसंवादे
क्रुरयवनशासनं-सायंदेववरप्रदानं नाम चतुर्दशोSध्यायः II
श्रीगुरूदत्तात्रेयार्पणमस्तु II श्रीगुरुदेवदत्त II
Guru Charitra Adhyay 14 PDF Download
इस गुरु चरित्र के अध्याय 14 (Adhyay) को आप यहाँ से PDF फॉर्मेट में मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं। यह PDF उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो Guru Charitra Adhyay 14 PDF को ऑफलाइन पढ़ना, सेव करना या दूसरों के साथ शेयर करना चाहते हैं।
⬇️ Download PDF
🙏 अगर आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो Daily Guru Charitra पाठ के लिए हमारे WhatsApp Channel से जुड़ें।
📲 Join WhatsApp Channel